बुद्ध धर्म के लोगोँ का मांसाहार खाना.
बुद्ध धर्म के लोगोँ का मांसाहार खाना, क्या गौतम बुद्ध का अपमान करना नहीँ हैँ...?
क्या महात्मा बुध्द की राह पर न चलना बुध्द का अपमान करना नहीँ हैँ ? क्या ये मुर्खता की पहचान नहीँ हैँ...?
मै बचपन एक बुद्ध धर्मी मित्र के घर गया था, तब उसके घर मेँ सब लोग "अंगुलीमाल" नामक एक फिल्म देख रहे थे, मैँने भी देखी...!
कथा के अनुसार, कुख्यात डाकु अंगुलीमाल जो इंसानो को मार कर उनकी अंगुलीया काट कर उनकी गलेँ मेँ माला पहनाता था ।
जब तथागत गौतम बुद्ध नेँ उसे कहा की,
"पेड के दो पत्ते तोड लाओ"
वह ले आया...
उसके पत्ते तोड लाने पर गौतम बुध्द ने फिर कहा,
"इन पत्तो को फिर से पेड पर जोड आवो"
तब अंगुलीमाल बोला "यह कैसे संभव हैँ, भला तोडे हुये पत्ते वापस कैसे जोड सकता हुँ..."
उसके बाद त. गौतम बुद्ध ने उसे उपदेश किया की
"हेँ अंगुलीमाल ! तुम जोड नही सकते तो, तुम तोडते क्योँ हो...?"
स्पष्ट है !
अर्थात 'तुम कीसी मृत प्राणी मेँ प्राण वापस नहीँ ला सकते तो उसे मारते क्यो हो'...?
तब मै समझा की बुद्ध धर्म मेँ भी अहिँसा का पाठ पढाया जाता है परंतु बुद्ध धर्म को लोग जो बुद्धविहार मेँ जाकर ढोँग करते है और जानवरोँका मांस खा रहे हैँ, उनको मैँ कुछ कह नहीँ सकता था...
उस वक्त मेरे पास सबुत नहीँ थे, आज हैँ मैनेँ पढा हैँ इसिलिये लिखने की हिम्मत कर रहा हुं...
धम्मपद की गाथा “दण्ड्वग्गो’ मे तथागत बुद्ध कहते है
: १२९.
सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बे भायन्ति मच्चुनो। अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥
सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अंत: सभी को अपने जैसा समझ कर न किसी की हत्या करे , न हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।
१३०.
सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं। अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥
सभी दंड से डरते हैं । सभी को अपना जिवन प्रिय लगता है । अंत: सभी को अपने जैसा समझ कर न तो किसी की हत्या करे या हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।
१३१.
सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति। अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो न लभते सुखं॥
जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित करता है (कष्ट पहुँचाता है) वह मर कर सुख नही पाता है ।
१३२.
सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन न हिंसति। अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो लभते सुखं॥
जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित नही करता है (कष्ट नही पहुँचाता है) वह मर कर सुख पाता है
namo bhuday.

Comments
Post a Comment