बुद्ध धर्म के लोगोँ का मांसाहार खाना भगवान बुध्द का मार्ग कही भी अतिवादी नही है यह मध्यम मार्ग है मानव जीवन जीते हुए जीव हत्या न हो यह सम्भव ही नही है। कारण यह है कि अनाज के हर दाने में जीवन है। हर पौधे में जीवन है । पानी ,दूध ,दही सभी मे अति सूक्ष्म जीव हैं। वायु में भी अति सूक्ष्म जीवन है। अगर हम अतिवाद में जाये तो दो मिनट भी हमारा जीवन सम्भव नही है। बौद्ध धम्म सभी प्राणियों पर करुणामयी हैं। परन्तु अतिवादी नही है। क्योंकि मानव जीवन ही जीवन चक्र से मुक्ति में सहायक है। अगर यही न रहा तो निर्वाण या मुक्ति सम्भव नही है। इसी प्रकार भगवान बुध्द भोजन ग्रहण और दान दिए भोजन में भी अतिवादी नही हैं। इसी लिये उन्होंने त्रिकोटी परिशुद्ध ( न देखा, न सुना, न सन्देह हो ) ऐसे मांसाहारी भोजन और दान को इस देह से कार्य लेने के लिये निषेध नही किया है। भगवान बुध्द ने प्राणी हिंसा को हर जगह हतोत्साहित किया है। भगवान बुध्द ने देशना की जैसे मैं हूँ, वैसे ही वे हैं, और ' जैसे वे हैं, वैसा ही मैं हूं। इस प्रकार सबको अपने जैसा समझकर न किसी को मारे और न ही मारने के लिए प्रेरित करें। त्रिक...